यह कोई फरमान भेज दे, मंजिल के पहरेदारों को,
हम बंजारों का कोई आसरा नहीं होता
मैं ढूँढता हूँ वो राह-ए-डगर जिसमें,
कोई उम्मीद के पाओं का निसाह नहीं होता
मैं फिरता हूँ येही है दास्तान मेरी,
हवाओं का घोषलों से कोई वास्ता नहीं होता
तेरी महफ़िल से उठकर जाएँ कहाँ.. नहीं सूझा,
रही यह आरज़ू की कोई दामन बढा होता
यह किस फिक्र में उलझा हुआ है - ए हमदम,
पतंगों की कुर्बानी पर कोई मज़ार नहीं होता
Author:Rakesh (copying prohibited)